• म्यांमार के विरूद्ध मुखर क्यों नहीं है भारत?

    म्यांमार में चार राजनीतिक कैदियों को फांसी दिये जाने को लेकर भारत ने शुक्रवार को चिंता प्रकट की है

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    - पुष्परंजन

    मणिपुर और मिज़ोरम, दोनों राज्यों में म्यांमार से भागकर आये शरणार्थियों की संख्या लाख से कम नहीं होगी। क्या इन्हें आबोदाना-आशियाना मुहैया कराना भारत के करदाताओं पर अतिरिक्त बोझ नहीं है? कल को यही शरणार्थी हमारे लिए रोहिंग्या की तरह सिरदर्द होंगे। ये आते लाखों में हैं, मगर इनकी वापसी सैकड़ों में होती है।

    म्यांमार में चार राजनीतिक कैदियों को फांसी दिये जाने को लेकर भारत ने शुक्रवार को चिंता प्रकट की है। भारत को बयान जारी करने में पांच दिन लगे हैं। क्यों? इसका बेहतर उत्तर विदेश मंत्रालय ही दे सकता है। म्यांमार-भारत की 1643 किलोमीटर सीमा मणिपुर, मिजोरम से लगी है। वहां से कई हज़ार किलोमीटर दूर अमेरिका, ब्रिटेन, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने त्वरित प्रतिक्रिया दी थी। शुक्रवार को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा कि भारत एक मित्र देश के नाते चाहेगा कि म्यांमार अपनी समस्याओं का समाधान शांतिपूर्ण तरीक़े से करे। क़ानून का शासन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान होना चाहिए। विदेश मंत्रालय का यह बयान पूरी सावधानी से दिया लगता है। 'सांप भी मर जाए और लाठी सलामत रहे', अदाज़े बयां कुछ इसी तरह से है। आप ये नहीं कह सकते कि भारत ने पड़ोस में घटित इतनी बड़ी घटना पर चुप्पी साध ली।

    1 फरवरी 2021 को मिल्टीऊ जंटा के प्रमुख जनरल मिन आंग हिलेंग ने जब लोकतांत्रिक रूप से चुनी सरकार को भंग किया था, उसके कुछ घंटों बाद उन्होंने अहद किया था कि साल भर में नई पार्टी और सरकार का गठन अपनी देखरेख में कराएंगे। मगर, हुआ उलट। 27 मार्च 2021 को म्यांमार में मिल्ट्री डे परेड हुआ था। उस दिन देशव्यापी प्रदर्शन में सौ लोगों को सेना ने मार दिया था। मगर, भारत उन आठ देशों के साथ सैनिक परेड का साक्षी था। तब सवाल उठने लगे थे कि क्या भारत प्रतिरोध को कुचल देने वाले सैन्य तानाशाहों का समर्थक है?

    पिछले साल भी हम म्यांमार में तख्ता पलट के बाद स्थितियों की हफ्तों 'समीक्षा' करते रहे। जब दुनिया के बड़े देश म्यांमार में दमन के विरूद्ध बयान जारी कर चुके, फिर भारत ने लजाते-शर्माते आधिकारिक वक्तव्य जारी करते हुए कहा था, ' म्यांमार की स्थिति को हम मॉनिटर कर रहे हैं। उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया और क़ानून के शासन को बनाये रखना चाहिए।' वही घिसा-पिटा बयान, 'लोकतांत्रिक प्रक्रिया और क़ानून का शासन!'

    दमनकारी सैन्य शासक के विरूद्ध इतना सॉफ्ट होने का कारण क्या कारोबार है? इस संदर्भ में कुछ घटनाओं की चर्चा ज़रूरी है। जुलाई 2019 में अडानी पोर्ट के सीईओ करण अडानी जनरल मिन आंग हिलेंग से मिले थे। मकसद, यांगून इंटरनेशनल टर्मिनल पर कंटेनर पोर्ट बनाना था, जिसमें 290 मिलियन डॉलर निवेश की हामी हो गई थी। इस वास्ते म्यांमार इकोनॉमिक कोऑपरेशन (एमईसी) के खाते में बतौर लीज़ फीस 30 मिलियन डॉलर अडानी गु्रप को जमा कराने थे। 31 मार्च, 2021 को ख़बर आई कि अडानी ग्रुप म्यांमार के मिल्ट्री शासकों से कोई डील नहीं चाहता है, और जून 2022 तक इस प्रोजेक्ट से हाथ खींच रहा है।

    मगर, रिलायंस के साथ ऐसा नहीं हुआ। 2014-15 वो कालखंड था, जब म्यांमार में लोकतंत्र की बयार बहने लगी थी। 26 मार्च, 2014 को रिलायंस इंडस्ट्री लिमिटेड (आरआईएल) ने म्यांमार के दो तेल-गैस ब्लॉक केजी, डी-6 हासिल किये। लोगों को हैरानी हुई थी कि अनुमानित लागत से कम प्राइस कोट करने के बावजूद 'आरआईएल' ने ये ब्लॉक हासिल कैसे कर लिये। बंगाल की खाड़ी में अवस्थित दोनों ब्लॉक कृष्णा-गोदावरी बेसिन में 8 हज़ार 100 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं।
    इसके साल भर बाद, 31 मार्च, 2015 को रिलायंस इंडस्ट्री लिमिटेड और म्यांमा गैस एंड ऑयल इंटरप्राइज़ के बीच दो ऑफ शोर ब्लॉक, 'एम-17 और एम-18' से तेल-गैस दोहन के वास्ते समझौता हुआ। 27 हज़ार 600 वर्ग किलोमीटर का यह इलाक़ा म्यांमार के पूर्वी हिस्से में टैनिनथार्यी नदी घाटी में अवस्थित है। इस साल के आख़िर में, या फि र 2023 के आरंभ में ब्लॉक केजी व डी-6 से तेल, गैस का दोहन आरंभ हो जाएगा। इसके अलावा टैनिनथार्यी बेसिन से भी उत्पादन की ख़बर जल्द मिलेगी। तो क्या म्यांमार के विरूद्ध भारत के मुखर न होने की वजह 'हम दो-हमारे दो' हैं?

    शुक्रवार को अखबार 'द इरावदी' की ख़बर थी कि म्यांमार में फांसी दिये जाने के समर्थन में जुलूस निकाले गये हैं। इसके आयोजन में सैन्य शासक समर्थक 'यूनियन सॉलिडरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी' के कार्यकर्ताओं और बौद्ध राष्ट्रवादियों की अहम भूमिका रही थी। जो देश सैन्य शासकों की निंदा कर रहे हैं, वहां के निवेशकों को म्यांमार में सताने का काम भी शुरू है। बुधवार को सैन्य शासन के प्रवक्ता जनरल जॉव मिन तुन का बयान आया था कि जिन $कैदियों को मौत की सज़ा दी गई है, उन्हें एक बार नहीं, कई बार फांसी दी जानी चाहिए थी।

    इस बयान से पहले मंगलवार को म्यांमार विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, अमेरिका और ब्रिटेन की आलोचना का प्रतिकार करते हुए कहा था कि ये देश और संगठन हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं। मतलब, म्यांमार का मिल्ट्री जंटा यह चाह रहा है कि वो अपने देश में चाहे जो कुछ करे, दुनिया मूकदर्शक होकर देखती रहे। मिल्ट्री जंटा इतना ढीठ क्या भारत के कम मुखर होने, और चीनी शह की वजह से है?

    जिन चार लोगों को मृत्युदंड मिला है, उनके परिवारवालों पर पूछताछ के बहाने दबाव बनाया जा रहा है। मृत्युदंड पाने वाले चार लोगों में से एक खो फ्यो ज़ेया थाओ नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) के कार्यकर्ता था। उसपर कई हिंसक हमले का आरोप था। यांगून आ रही एक पैसेंजर ट्रेन में पांच पुलिसवालों को गोलियों से उड़ा देने में भी खो फ्यो का हाथ बताया गया था। खो फ्यो नवंबर 2021 में गिरफ्तार किया गया था। जनवरी 2022 में आतंक निरोधक क़ानून के तहत खो फ्यो ज़ेया थाओ को मौत की सज़ा सुनाई गई। मिल्ट्री अदालत ने हिप-हॉप स्टार से 'एनएलडी' सांसद बने खो जिमी ( खो ख्याऊ मिन यू) को सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट के अपराध में सज़ा-ए-मौत दी है। बाकी़ दो लोगों को फांसी की सज़ा एक मिल्ट्री मुखबिर को मार डालने की वजह से सुनाई गई है।

    थाईलैंड के माए सोत स्थित 'असिस्टेंस एसोसिएशन फर पॉलिटिकल प्रिज़नर्स' ने एक सूची जारी कर जानकारी दी है कि तख्ता पलट के बाद से 1929 लोगों को सैन्य शासन ने मारा है, 11 हज़ार 4 लोग नजरबंद हैं। दूसरे स्रोत बताते हैं कि सैन्य अदालत से अबतक 118 लोगों को सजाए मौत मिल चुकी है। उससे अलग पुलिस व सेना द्वारा मारे गये लोगों की बड़ी तादाद है।

    इस प्रकरण में आसियान बुरा फं सा हुआ है। म्यांमार न उसे उगलते बन रहा है, न निगलते। इंडोनेशिया, मलयेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, फिलीपींस, कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, वियतनाम, ब्रुनेई जैसे दस देशों का संगठन है 'आसियान'। आसियान के चार्टर में है कि दसों में किसी सदस्य देश पर मुसीबत आती है, तो उसका मिलकर मुकाबला करेंगे, और किसी बाहरी देश का दखल नहीं होने देंगे। कंबोडिया 'आसियान' का वर्तमान अध्यक्ष देश है।

    मुश्किल यह है कि सिंगापुर चार महीने के भीतर ड्रग तस्करी के अपराध में पांचवे व्यक्ति को मृत्युदंड दे चुका है। ऐसे में आसियान, म्यांमार में मृत्युदंड को मुद्दा बनाये कैसे? मलयेशिया के विदेश मंत्री सैफु द्दीन अब्दुल्ला ने बयान जारी कर कहा कि म्यांमार की सैन्य अदालत ने जो फ़ै सला सुनाया है, वह मानवता के विरूद्ध है। थाईलैंड में इसका व्यापक विरोध देखा जा रहा है। बैंकाक में म्यांमार दूतावास के समक्ष पूरे हफ्ते लगातार प्रदर्शन हुए हैं।

    जकार्ता में 24 अप्रैल, 2021 को आसियान शिखर बैठक हुई थी, जिसमें नौ देशों के शासन प्रमुख और म्यांमार के सैन्य शासक जनरल मिन आंग हिलेंग उपस्थित थे। उस बैठक में म्यांमार ने पांच सूत्री कार्यक्रम में सहमति दी थी। इन पांच बिंदुओं में म्यांमार में हिंसक टकराव पर तत्काल रोक, सभी पार्टियों से संवाद, आसियान द्वारा मानवीय सहयोग, इनके विशेष दूत सभी दलों के लोगों से मिलें, जैसी बातें थीं। जकार्ता बैठक के सवा साल गुज़र गये, जनरल मिन आंग हिलेंग ने पांच बिंदुओं पर कितना अमल किया, उसे लेकर आसियान सदस्यों में निराशा है। ऐसे में बहुत हद तक संभव है कि म्यांमार स्वयं आसियान छोड़ दे, अथवा उसे संगठन से निलंबित करने का फ रमान जारी हो।

    म्यांमार-भारत की 1643 किलोमीटर सीमा मणिपुर, मिजोरम से लगी है। जब से सैन्य शासन लगा है, म्यांमार से पलायन कर हमारी तरफ कितने लोग आये? गृह मंत्रालय इस प्रश्न पर चुप है। 18 मार्च, 2021 को मिज़ोरम के मुख्यमंत्री जोरामथांगा ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर सतर्क किया था कि सीमा पर जो कुछ हो रहा है, उससे हम आंखें मूंद नहीं सकते। 20 मार्च, 2021 को मिजोरम से राज्यसभा सांसद के वनलालवेना ने जानकारी दी कि म्यांमार से भाग कर आये शरणार्थियों की संख्या हज़ार से अधिक है।

    तख्ता पलट के बाद म्यंामार की तरह मणिपुर में भी हज़ारों की तादाद में शरणार्थी आ चुके थे। उन दिनों राज्य शासन ने ज़िले के कलेक्टरों को जो निर्देश जारी किये थे, उससे इसकी पुष्टि होती है। जो बात दिल्ली में ज़ेरे बहस नहीं होती, वो ये कि सीमा पर लापरवाही के कारण साल भर में ही यह संख्या 20 से 30 गुना बढ़ चुकी है। 12 अप्रैल, 2022 को ख़बर आई कि मिज़ोरम सरकार ने म्यांमार से आये 22 हज़ार शरणार्थियों को पहचान पत्र जारी किया है। मिजोरम की 510 किलोमीटर सीमा का जब ये हाल है, तो मणिपुर की सीमा उससे दो गुनी से अधिक है, जो म्यांमार से लगी है।

    आप मानकर चलिये कि मणिपुर और मिज़ोरम, दोनों राज्यों में म्यांमार से भागकर आये शरणार्थियों की संख्या लाख से कम नहीं होगी। क्या इन्हें आबोदाना-आशियाना मुहैया कराना भारत के करदाताओं पर अतिरिक्त बोझ नहीं है? भारत सरकार को चाहिए था कि इस समस्या से म्यांमार के सैन्य शासकों को अवगत कराये। कल को यही शरणार्थी हमारे लिए रोहिंग्या की तरह सिरदर्द होंगे। ये आते लाखों में हैं, मगर इनकी वापसी सैकड़ों में होती है।
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